भगवद गीता का प्रथम अध्याय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद का आरंभ होता है। इस अध्याय में अर्जुन ने अपने सामने दोनों सेनाओं के समान्य चित्र को देखकर शंका व्यक्त की है। वह युद्ध करने में असमर्थ महसूस करता है और इससे उसके मन में दुःख और विपत्ति की भावना उत्पन्न होती है।
भगवान श्रीकृष्ण उसे युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए उसकी शंकाओं को दूर करने के लिए उपदेश देते हैं। वे अर्जुन को उसके कर्तव्य का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे समझाते हैं कि जीवन में दुःख और सुख दोनों होते हैं, लेकिन उन्हें भोगने का तरीका बताते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण अपने उपदेश में कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के तीन मुख्य विधानों को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने अर्जुन को उसके स्वधर्म का पालन करने के लिए प्रेरित किया है और उन्होंने उसे युद्ध में सफलता के लिए उचित उपाय बताए हैं।
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों को भी उपदेश दिया है जो युद्ध के बिना ही जीवन जीते हैं। वे अपने कर्मों से आत्मसमर्पण करें और उन्हें ईश्वर की अर्पण करें। इसके लिए उन्हें आत्मा और परमात्मा के बीच के तत्व का ज्ञान होना जरूरी है।
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश देते हुए यह भी बताया है कि जीवन में संघर्ष अपरिहार्य होता है। जीवन में होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सक्षम होना जरूरी होता है और उन्हें प्रबल बनाना होगा। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय आग्रह किया था कि अर्जुन उन चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार हो जाएं।
इस प्रथम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए उसके मन के सभी संदेहों को दूर करने का प्रयास किया है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के तीन मुख्य विधानों को स्पष्ट किया है।


